सीबीआई निदेशक के पद से हटाए गए भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी आलोक वर्मा से सरकार ने नए कार्यालय में कार्यभार संभालने के लिए कहा है.
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक गृह मंत्रालय की ओर से वर्मा को बुधवार को भेजे गए पत्र में उनसे अग्निशमन सेवाओं, नागरिक सुरक्षा और होम गार्ड्स विभाग के महानिदेशक के पद पर कार्यभार संभालने के लिए कहा है.
सीबीआई से हटाए जाने के बाद वर्मा ने विभाग से कहा था कि उन्हें सेवानिवृत्त माना जाए. उनका कार्यकाल 31 जनवरी यानी आज ही समाप्त हो रहा है.
द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक यदि देश के 25 फ़ीसदी ग़रीब परिवारों के कम से कम एक व्यक्ति की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने की योजना लाई जाती है तो सरकार को कम से कम सात लाख करोड़ रुपये ख़र्च करने पड़ सकते हैं.
ये आंकड़ा 321 रुपये प्रति दिन की दर से न्यूनतम मज़दूरी भत्ते के हिसाब से तय किया गया है.
हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि यदि चुनावों के बाद उनकी पार्टी की सरकार बनी तो वो देश के ग़रीब परिवारों के लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित करेंगे.
द इंडियन एक्सप्रेस ने गुरुवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजयेपी के अयोध्या विवाद पर संसद में दिए गए एक बयान को याद किया है.
17 साल पहले 14 मार्च 2002 को राज्य सभा में दिए एक बयान में वाजपेयी ने कहा था कि उनकी सरकार विवादित भूमि की वैधानिक रिसिवर है और वहां यथास्थिति बनाए रखना उसका कर्तव्य है.
अटल बिहारी वाजयेपी उस समय एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने सदन को बताया था कि सरकार ने न्यास की ओर से विवादित भूमि पर पूजा करने की मांग की सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल की गई अर्ज़ी पर कोई शपथपत्र पेश नहीं किया है.
हाल ही में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार ने अदालत से कहा है कि वो विवादित भूमि के नज़दीक स्थित 67 एकड़ भूमि को उसके मूल मालिकों को लौटा दे.
द हिंदू अख़बार में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने कांग्रेसी विधायकों पर सरकार की छवि ख़राब करने के आरोप लगाए हैं.
कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर की गठबंधन सरकार के कामकाज पर कांग्रेसी विधायकों ने सार्वजनिक टिप्पणियां की हैं.
मुख्यमंत्री एचडी कुमारास्वामी इन टिप्पणियों से नाराज़ हैं. देवेगौड़ा ने कांग्रेस नेतृत्व को चेताते हुए कहा है कि चीज़ों के हाथ से निकलने से पहले ही सुधार किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "गठबंधन के बारे में हल्की भाषा में बात न करें वरना चीज़ें हाथ से निकल जाएंगी और हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे."
Wednesday, January 30, 2019
Tuesday, January 22, 2019
नागरिकता संशोधन विधेयक पर क्या है भाजपा की असल राजनीति
नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ अब आवाज़ एनडीए के भीतर से भी उठने लगी है. गठबंधन में शामिल नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने इसके ख़िलाफ़ हल्ला बोलने की घोषणा की है.
पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि पार्टी पुरानी नीतियों और सिद्धांतों पर क़ायम रहेगी. उन्होंने कहा है कि वो "भाजपा को आंख मूंद कर समर्थन नहीं करेंगे."
पार्टी नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में 27 और 28 जनवरी को असम में निकाली जाने वाली रैली में शामिल होगी. उसके वरिष्ठ नेता ख़ुद इस रैली में शिरकत करेंगे.
इससे पहले एनडीए में शामिल रही असम गण परिषद इस मुद्दे पर गठबंधन से अपना नाता तोड़ चुकी है और इसके नेता विधेयक को असम संस्कृति के लिए ख़तरा बता रहे हैं.
नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 लोकसभा से पास हो चुका है और राज्यसभा के अगले सत्र में इस पर विस्तार से चर्चा होगी.
ये विधेयक जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था, जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.
पड़ोसी देशों के मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है. विधेयक में प्रावधान है कि ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के लोग अगर भारत में छह साल गुज़ार लेते हैं तो वे आसानी से नागरिकता हासिल कर पाएंगे. पहले ये अवधि 11 साल थी.
इस मुद्दे पर अब विवाद बढ़ता दिख रहा है. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के घटक दल, जिनका कुछ आधार मुस्लिम मतादाताओं के बीच भी है, उनमें इसे लेकर बेचैनी है.
सवाल उठता है कि क्या चुनाव आते-आते इस मुद्दे पर एनडीए कुनबा बिखरने लगेगा? इस सवाल के जवाब में असम के वरिष्ठ पत्रकार नवा ठाकुरिया कहते हैं कि इससे भाजपा को पूर्वोत्तर में नुक़सान झेलना पड़ सकता है.
वो कहते हैं, "इस विधेयक से पूर्वोत्तर भारत के अलावा देश का अन्य हिस्सा बहुत प्रभावित नहीं होगा. हिंदी पट्टी के क्षेत्र इसके समर्थन में है. सिर्फ़ विरोध है पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों में."
"अन्य जगहों पर अपनी मज़बूती बनाने के लिए एक राष्ट्रीय पार्टी किसी एक क्षेत्र का बलिदान कर सकती है. असम की बात की जाए तो यहां भी भाजपा को बहुत नुक़सान नहीं होगा. कुछ नुक़सान से अगर अन्य राज्यों में फ़ायदा मिलता है तो यह रणनीति बेहतर मानी जाएगी."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी भी नवा ठाकुरिया की बातों से सहमत दिखते हैं. वो कहते हैं कि भाजपा का मूल मक़सद हिंदू राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाने का है.
वो कहते हैं, "पार्टी ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि जिन घुसपैठियों ने भारत में बहुत जगह बना ली है, ख़ासकर कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेश और दूसरे पड़ोसी देशों से जो लोग अवैध तरीक़े से आकर रह रहे हैं, वो उन्हें यहां नहीं रहने देना चाहते हैं."
सरकार ऐसे घुसपैठियों में से कुछ को नागरिकता देना चाहती हैं और कुछ को नहीं. अगर पाकिस्तान से हिंदू आ रहे हैं तो उन्हें नागरिकता दी जाएगी, लेकिन मुसलमान आते हैं तो नागरिकता नहीं दी जाएगी.
वो कहते हैं कि ये पूरी राजनीति देश के बाक़ी हिस्सों में भुनाने और वोट बैंक मज़बूत करने की कोशिश है.
असम के वरिष्ठ पत्रकार ठाकुरिया इसके पीछे की रानजीति समझाते हैं. वो कहते हैं "भारत के 60 प्रतिशत हिंदू अब 'वोट बैंक' बन गए हैं. पहले दलित वोट बैंक होता था, मुस्लिम वोट बैंक होता था, लेकिन अब हिंदू भी वोट बैंक बन चुका है."
और यही कारण है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इसका विरोध नहीं करना चाहती है. राज्य सभा में कांग्रेस इस बिल का विरोध ज़रूर करेगी पर इसके ख़िलाफ़ वोट नहीं करेगी.
ठाकुरिया कहते हैं कि अगर कांग्रेस इसके ख़िलाफ़ वोट करेगी तो वो राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और दूसरे इलाक़े खो सकती है.
पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि पार्टी पुरानी नीतियों और सिद्धांतों पर क़ायम रहेगी. उन्होंने कहा है कि वो "भाजपा को आंख मूंद कर समर्थन नहीं करेंगे."
पार्टी नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में 27 और 28 जनवरी को असम में निकाली जाने वाली रैली में शामिल होगी. उसके वरिष्ठ नेता ख़ुद इस रैली में शिरकत करेंगे.
इससे पहले एनडीए में शामिल रही असम गण परिषद इस मुद्दे पर गठबंधन से अपना नाता तोड़ चुकी है और इसके नेता विधेयक को असम संस्कृति के लिए ख़तरा बता रहे हैं.
नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 लोकसभा से पास हो चुका है और राज्यसभा के अगले सत्र में इस पर विस्तार से चर्चा होगी.
ये विधेयक जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था, जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.
पड़ोसी देशों के मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है. विधेयक में प्रावधान है कि ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के लोग अगर भारत में छह साल गुज़ार लेते हैं तो वे आसानी से नागरिकता हासिल कर पाएंगे. पहले ये अवधि 11 साल थी.
इस मुद्दे पर अब विवाद बढ़ता दिख रहा है. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के घटक दल, जिनका कुछ आधार मुस्लिम मतादाताओं के बीच भी है, उनमें इसे लेकर बेचैनी है.
सवाल उठता है कि क्या चुनाव आते-आते इस मुद्दे पर एनडीए कुनबा बिखरने लगेगा? इस सवाल के जवाब में असम के वरिष्ठ पत्रकार नवा ठाकुरिया कहते हैं कि इससे भाजपा को पूर्वोत्तर में नुक़सान झेलना पड़ सकता है.
वो कहते हैं, "इस विधेयक से पूर्वोत्तर भारत के अलावा देश का अन्य हिस्सा बहुत प्रभावित नहीं होगा. हिंदी पट्टी के क्षेत्र इसके समर्थन में है. सिर्फ़ विरोध है पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों में."
"अन्य जगहों पर अपनी मज़बूती बनाने के लिए एक राष्ट्रीय पार्टी किसी एक क्षेत्र का बलिदान कर सकती है. असम की बात की जाए तो यहां भी भाजपा को बहुत नुक़सान नहीं होगा. कुछ नुक़सान से अगर अन्य राज्यों में फ़ायदा मिलता है तो यह रणनीति बेहतर मानी जाएगी."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी भी नवा ठाकुरिया की बातों से सहमत दिखते हैं. वो कहते हैं कि भाजपा का मूल मक़सद हिंदू राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाने का है.
वो कहते हैं, "पार्टी ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि जिन घुसपैठियों ने भारत में बहुत जगह बना ली है, ख़ासकर कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेश और दूसरे पड़ोसी देशों से जो लोग अवैध तरीक़े से आकर रह रहे हैं, वो उन्हें यहां नहीं रहने देना चाहते हैं."
सरकार ऐसे घुसपैठियों में से कुछ को नागरिकता देना चाहती हैं और कुछ को नहीं. अगर पाकिस्तान से हिंदू आ रहे हैं तो उन्हें नागरिकता दी जाएगी, लेकिन मुसलमान आते हैं तो नागरिकता नहीं दी जाएगी.
वो कहते हैं कि ये पूरी राजनीति देश के बाक़ी हिस्सों में भुनाने और वोट बैंक मज़बूत करने की कोशिश है.
असम के वरिष्ठ पत्रकार ठाकुरिया इसके पीछे की रानजीति समझाते हैं. वो कहते हैं "भारत के 60 प्रतिशत हिंदू अब 'वोट बैंक' बन गए हैं. पहले दलित वोट बैंक होता था, मुस्लिम वोट बैंक होता था, लेकिन अब हिंदू भी वोट बैंक बन चुका है."
और यही कारण है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इसका विरोध नहीं करना चाहती है. राज्य सभा में कांग्रेस इस बिल का विरोध ज़रूर करेगी पर इसके ख़िलाफ़ वोट नहीं करेगी.
ठाकुरिया कहते हैं कि अगर कांग्रेस इसके ख़िलाफ़ वोट करेगी तो वो राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और दूसरे इलाक़े खो सकती है.
Thursday, January 10, 2019
हड़प्पा काल में दफ़न 'प्रेमी जोड़े' के कंकाल ने खोले कई राज़
हरियाणा में हिसार ज़िले के राखीगढ़ी गांव में हड़प्पा सभ्यता से जुड़े एक क्षेत्र की खुदाई के दौरान लगभग 4500 साल पुराने 'प्रेमी जोड़े' का कंकाल मिले हैं.
साल 2016 में भारत और दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों को ये कंकाल मिले थे और बीते दो सालों में इस जोड़े की मौत के पीछे की वजहों को लेकर शोध किया जा रहा था. इस शोध को अब एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में छापा जा चुका है.
पुरातत्वविद बसंत शिंदे ने इस संबंध में बीबीसी को बताया, ''एक महिला और एक पुरुष के ये कंकाल एक-दूसरे की ओर देखते हुए प्रतीत होते हैं. ऐसा लगता है जैसे ये एक प्रेमी जोड़ा रहा होगा और दोनों की मौत एक ही जगह पर हुई. लेकिन इनकी मौत कैसे हुई ये अभी भी एक रहस्य है.''
सौ करोड़ रुपये का नंबर प्लेट और दुबई का वो शेख़
ये कंकाल आधे मीटर रेतीली ज़मीन में दफ़न थे. वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मौत के वक़्त पुरुष की उम्र करीब 35 साल रही होगी और महिला लगभग 25 साल की होगी. दोनों की लंबाई क्रमशः 5 फ़ीट 8 इंच और 5 फ़ीट 6 इंच रही होगी. इन कंकालों की हड्डियां बिलकुल साधारण हैं. ऐसा नहीं लगता कि इन दोनों को किसी तरह की कोई बीमारी थी.
पुरातत्वविदों का कहना है कि इस तरह की क़ब्र किसी खास परंपरा का हिस्सा तो नहीं थीं. हां ये संभव है कि इस जोड़े की मौत एक साथ हुई हो और इसलिए इन्हें साथ में एक ही क़ब्र में दफ़नाया गया होगा.
राखीगढ़ी में मिली सभी चीज़ें बेहद आम हैं. ये वही चीज़े हैं जो अब तक हड़प्पा सभ्यता में मिलती आयी हैं. इस कंकाल के अलावा खुदाई में कुछ मिट्टी के बर्तन और कुछ गहने मिले हैं जो कांस्य युग के हैं. अर्ली इंडियन के लेखक टोनी जोसफ़ कहते हैं, ''हड़प्पा युग के अंतिम संस्कारों को देखें तो पता चलता है कि ये लोग साधारण परंपराओं का पालन करते थे.''
अगर मैसोपोटामिया सभ्यता की बात करें तो वहां राजाओं को मंहगे आभूषण, कलाकृतियों और बड़ी होर्डिंग के साथ दफ़नाया जाता था. ख़ास बात ये है कि मैसोपोटामिया की सभ्यता में कई ऐसे कंकाल मिले जिनमें हड़प्पा सभ्यता के आभूषण थे. ऐसा माना जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के गहनों को उस वक़्त आयात किया जाता था.
पुरातत्वविदों का मानना है कि ये जोड़ा 1200 एकड़ की एक बस्ती में रहता था जहां लगभग 10 हज़ार लोगों के घर थे. भारत और पाकिस्तान में लगभग दो हज़ार हड़प्पा साइट की खोज की गई है. राखीगढ़ी अब हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े शहर मोहन जोदाड़ो से भी बड़ा है.
राखीगढ़ी में पुरातत्वविदों को एक क़ब्रिस्तान में लगभग 70 क़ब्रें मिली हैं. लेकिन इस 'रहस्यमी जोड़े' के कंकाल ने सबसे ज़्यादा सुर्खियां बटोरी हैं.
साल 2016 में भारत और दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों को ये कंकाल मिले थे और बीते दो सालों में इस जोड़े की मौत के पीछे की वजहों को लेकर शोध किया जा रहा था. इस शोध को अब एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में छापा जा चुका है.
पुरातत्वविद बसंत शिंदे ने इस संबंध में बीबीसी को बताया, ''एक महिला और एक पुरुष के ये कंकाल एक-दूसरे की ओर देखते हुए प्रतीत होते हैं. ऐसा लगता है जैसे ये एक प्रेमी जोड़ा रहा होगा और दोनों की मौत एक ही जगह पर हुई. लेकिन इनकी मौत कैसे हुई ये अभी भी एक रहस्य है.''
सौ करोड़ रुपये का नंबर प्लेट और दुबई का वो शेख़
ये कंकाल आधे मीटर रेतीली ज़मीन में दफ़न थे. वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मौत के वक़्त पुरुष की उम्र करीब 35 साल रही होगी और महिला लगभग 25 साल की होगी. दोनों की लंबाई क्रमशः 5 फ़ीट 8 इंच और 5 फ़ीट 6 इंच रही होगी. इन कंकालों की हड्डियां बिलकुल साधारण हैं. ऐसा नहीं लगता कि इन दोनों को किसी तरह की कोई बीमारी थी.
पुरातत्वविदों का कहना है कि इस तरह की क़ब्र किसी खास परंपरा का हिस्सा तो नहीं थीं. हां ये संभव है कि इस जोड़े की मौत एक साथ हुई हो और इसलिए इन्हें साथ में एक ही क़ब्र में दफ़नाया गया होगा.
राखीगढ़ी में मिली सभी चीज़ें बेहद आम हैं. ये वही चीज़े हैं जो अब तक हड़प्पा सभ्यता में मिलती आयी हैं. इस कंकाल के अलावा खुदाई में कुछ मिट्टी के बर्तन और कुछ गहने मिले हैं जो कांस्य युग के हैं. अर्ली इंडियन के लेखक टोनी जोसफ़ कहते हैं, ''हड़प्पा युग के अंतिम संस्कारों को देखें तो पता चलता है कि ये लोग साधारण परंपराओं का पालन करते थे.''
अगर मैसोपोटामिया सभ्यता की बात करें तो वहां राजाओं को मंहगे आभूषण, कलाकृतियों और बड़ी होर्डिंग के साथ दफ़नाया जाता था. ख़ास बात ये है कि मैसोपोटामिया की सभ्यता में कई ऐसे कंकाल मिले जिनमें हड़प्पा सभ्यता के आभूषण थे. ऐसा माना जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के गहनों को उस वक़्त आयात किया जाता था.
पुरातत्वविदों का मानना है कि ये जोड़ा 1200 एकड़ की एक बस्ती में रहता था जहां लगभग 10 हज़ार लोगों के घर थे. भारत और पाकिस्तान में लगभग दो हज़ार हड़प्पा साइट की खोज की गई है. राखीगढ़ी अब हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े शहर मोहन जोदाड़ो से भी बड़ा है.
राखीगढ़ी में पुरातत्वविदों को एक क़ब्रिस्तान में लगभग 70 क़ब्रें मिली हैं. लेकिन इस 'रहस्यमी जोड़े' के कंकाल ने सबसे ज़्यादा सुर्खियां बटोरी हैं.
Friday, January 4, 2019
अयोध्या राम मंदिर पर SC की सुनवाई 10 जनवरी तक टली
सुप्रीम कोर्ट में मौजूद हमारे सहयोगी सुचित्र मोहंती के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा, "10 जनवरी को इस मामले में आगे के आदेश उपयुक्त बेंच देगी."
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के साल 2010 के फ़ैसले के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील की गईं हैं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में अयोध्या की 2.77 एकड़ ज़मीन सुन्नी वक़्फ बोर्ड, र्निमोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर बांटने का फ़ैसला दिया था.
प्रीम कोर्ट में इस मामले में इससे पहले सुनवाई 29 अक्टूबर को हुई थी और ये सुनवाई चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. के. कौल और जस्टिस के. एम. जोसेफ़ के तीन जजों की पीठ ने किया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था.
कब-कब क्या हुआ?
अयोध्या विवाद भारत में एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है. कई हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी थी.
भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद सहित कई हिंदू संगठनों का दावा है कि हिंदुओं के आराध्यदेव राम का जन्म ठीक वहीं हुआ जहां बाबरी मस्जिद थी. उनका दावा है कि बाबरी मस्जिद दरअसल, एक मंदिर को तोड़कर बनवाई गई थी.
बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देश में दंगे भड़के और सर्वोच्च अदालत में मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की ज़ोर शोर से मांग उठाई गई.
विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ का ये मामला देश की अदालतों में 1949 से ही चला आ रहा है. हम आपको बताते हैं कि पूरा मामला कब शुरू हुआ और अब तक इस विवाद में समय का पहिया कैसे घूमा है.
1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे कुछ हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं.
1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी, जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था. अब कुछ हिंदू संगठन उस जगह पर राम मंदिर बनाना चाहते हैं.
1859: ब्रिटिश शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी.
1949: भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं. कथित रूप से कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाई थीं. मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया. सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके यहां ताला लगा दिया.
बाबरी विध्वंस से भाजपा ने क्या खोया, क्या पाया?
1984: कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को "मुक्त" करने और वहां राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के साल 2010 के फ़ैसले के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील की गईं हैं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में अयोध्या की 2.77 एकड़ ज़मीन सुन्नी वक़्फ बोर्ड, र्निमोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर बांटने का फ़ैसला दिया था.
प्रीम कोर्ट में इस मामले में इससे पहले सुनवाई 29 अक्टूबर को हुई थी और ये सुनवाई चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. के. कौल और जस्टिस के. एम. जोसेफ़ के तीन जजों की पीठ ने किया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था.
कब-कब क्या हुआ?
अयोध्या विवाद भारत में एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है. कई हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी थी.
भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद सहित कई हिंदू संगठनों का दावा है कि हिंदुओं के आराध्यदेव राम का जन्म ठीक वहीं हुआ जहां बाबरी मस्जिद थी. उनका दावा है कि बाबरी मस्जिद दरअसल, एक मंदिर को तोड़कर बनवाई गई थी.
बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देश में दंगे भड़के और सर्वोच्च अदालत में मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की ज़ोर शोर से मांग उठाई गई.
विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ का ये मामला देश की अदालतों में 1949 से ही चला आ रहा है. हम आपको बताते हैं कि पूरा मामला कब शुरू हुआ और अब तक इस विवाद में समय का पहिया कैसे घूमा है.
1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे कुछ हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं.
1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी, जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था. अब कुछ हिंदू संगठन उस जगह पर राम मंदिर बनाना चाहते हैं.
1859: ब्रिटिश शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी.
1949: भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं. कथित रूप से कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाई थीं. मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया. सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके यहां ताला लगा दिया.
बाबरी विध्वंस से भाजपा ने क्या खोया, क्या पाया?
1984: कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को "मुक्त" करने और वहां राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.
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